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इजरायलियों के लिए पहले भी संकटमोचक बने भारतीय, मुंबई हमले में दिखी थी बहादुरी

nidhi
2 Oct 2026 7:57 AM IST
इजरायलियों के लिए पहले भी संकटमोचक बने भारतीय, मुंबई हमले में दिखी थी बहादुरी
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आतंकियों की गोलियों के बीच मासूम को लेकर निकली थीं सैंड्रा

नई दिल्ली: तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में भारतीय पायलट स्मित मच्छर की बहादुरी से 170 से अधिक लोगों की जान बचने की घटना ने भारत और इजरायल से जुड़ी एक पुरानी कहानी फिर याद दिला दी है। इससे करीब 18 साल पहले मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमलों के दौरान भी एक भारतीय महिला ने अपनी जान जोखिम में डालकर इजरायली बच्चे को आतंकियों के बीच से सुरक्षित बाहर निकाला था।

26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले में कई स्थानों को निशाना बनाया गया था। इनमें छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, ताज होटल, ओबेरॉय-ट्राइडेंट, लियोपोल्ड कैफे और नरीमन हाउस शामिल थे। नरीमन हाउस यहूदी समुदाय का केंद्र था, जहां बड़ी संख्या में यहूदी और इजरायली यात्रियों का आना-जाना रहता था। नरीमन हाउस को भी आतंकियों ने अपने कब्जे में ले लिया था। यहां रब्बी गैव्रियल होल्ट्जबर्ग और उनकी पत्नी रिवका होल्ट्जबर्ग रहते थे। उनका दो साल का बेटा मोशे भी उसी इमारत में मौजूद था। आतंकियों के हमले के दौरान रब्बी और उनकी पत्नी समेत कई लोगों की मौत हो गई, लेकिन मासूम मोशे बच गया।
मोशे की जान बचाने वाली भारतीय महिला का नाम सैंड्रा सैमुअल था। वह होल्ट्जबर्ग परिवार के यहां नैनी के तौर पर काम करती थीं। जब नरीमन हाउस में गोलीबारी शुरू हुई तो सैंड्रा ने खुद को एक कमरे में छिपा लिया। उनके साथ एक अन्य कर्मचारी भी मौजूद था। इमारत के अंदर लगातार गोलियों और धमाकों की आवाजें आ रही थीं।
इसी दौरान सैंड्रा को मोशे के रोने की आवाज सुनाई दी। खतरा होने के बावजूद उन्होंने बच्चे को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी ओर जाने का फैसला किया। वह ऊपर पहुंचीं और मोशे को अपने पास लिया। इसके बाद उसे गोद में उठाकर आतंकियों की मौजूदगी वाली इमारत से बाहर निकल आईं। सैंड्रा की इस बहादुरी की दुनियाभर में चर्चा हुई थी। उन्होंने उस समय अपनी जान की परवाह किए बिना बच्चे को बचाया, जब इमारत के अंदर आतंकी मौजूद थे और किसी भी समय गोलीबारी हो सकती थी। मोशे के माता-पिता हमले में मारे गए थे और वह महज दो साल की उम्र में इस घटना का जीवित गवाह बना।
26/11 के मुंबई हमलों में कुल 166 लोगों की मौत हुई थी और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। हमले को अंजाम देने वाले 10 आतंकियों में से नौ सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए थे, जबकि अजमल कसाब को जीवित पकड़ा गया था। बाद में उस पर मुकदमा चला और उसे फांसी की सजा दी गई।
नरीमन हाउस पर हमला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खास चिंता का विषय बना था क्योंकि यह यहूदी समुदाय से जुड़ा केंद्र था। यहां मौजूद लोगों को बंधक बनाया गया था और सुरक्षा बलों को लंबा ऑपरेशन चलाना पड़ा। बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के कमांडो ने इमारत में अभियान चलाया। इस ऑपरेशन में एक एनएसजी कमांडो की भी जान गई थी। हमले के बाद मोशे अपने परिवार के साथ इजरायल चला गया। बाद के वर्षों में वह भारत भी आया और नरीमन हाउस पहुंचा, जहां उसके माता-पिता की मौत हुई थी। इस दौरान सैंड्रा सैमुअल भी उसके साथ मौजूद थीं।
अब अक्टूबर 2026 में भारतीय पायलट स्मित मच्छर की घटना ने सैंड्रा की बहादुरी की याद फिर ताजा कर दी है। फ्लाईदुबई की दुबई से तेल अवीव जा रही उड़ान में मच्छर पर उनके सह-पायलट ने कथित तौर पर हमला किया था। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता हासिल की, जिसके बाद यात्रियों और क्रू ने हमलावर को काबू किया। विमान में 174 यात्री सवार थे और बाद में इसे सऊदी अरब के तबूक में सुरक्षित उतारा गया।
इस घटना में विमान में मौजूद ऑफ-ड्यूटी पायलटों और यात्रियों ने भी मदद की। भारतीय पायलट का इलाज सऊदी अरब में किया गया और उनकी हालत स्थिर बताई गई। हमले के पीछे की वजह की जांच जारी है। स्मित मच्छर और सैंड्रा सैमुअल की घटनाएं अलग-अलग दौर और परिस्थितियों की हैं, लेकिन दोनों में एक समान बात सामने आती है—संकट के समय भारतीय नागरिकों ने अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना दूसरों की जान बचाने का प्रयास किया। मुंबई में सैंड्रा ने दो साल के मोशे को आतंकियों के बीच से निकाला था, जबकि करीब 18 साल बाद एक भारतीय पायलट ने हवा में पैदा हुए गंभीर संकट के बीच यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई।
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